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शिक्षक की लापरवाही से बच्चों का भविष्य खतरे में:

शिक्षक की लापरवाही से बच्चों का भविष्य खतरे में:

जूनापानी प्राथमिक विद्यालय में नहीं होती पढ़ाई, NSUI ने उठाई आवाज़

बड़वानी (नरेन्द्र गुप्ता)- आदिवासी अंचल में शिक्षा की स्थिति पहले से ही संघर्षपूर्ण है, ऐसे में यदि शिक्षक ही अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएं तो यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। बड़वानी जिले के पलसूद विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत रेवजा के शासकीय प्राथमिक विद्यालय जूनापानी में शिक्षकीय लापरवाही का मामला गंभीर रूप ले चुका है। इस विद्यालय में न तो समय पर स्कूल खुलता है, न ही बच्चों को सही ढंग से पढ़ाया जाता है।इस पूरे प्रकरण को उजागर किया है NSUI बड़वानी छात्र नेता बादल गिरासे और उनकी टीम ने, जिनके नेतृत्व में पालकों व ग्रामीणों ने मिलकर स्कूल में व्याप्त अनियमितताओं के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की है।

स्कूल समय पर नहीं खुलता, शिक्षक 12 बजे आते हैंशासकीय नियमों के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों का संचालन प्रातः 11 .00 बजे से प्रारंभ होना चाहिए, लेकिन जूनापानी स्कूल में शिक्षक प्रायः दोपहर 12:00 बजे विद्यालय पहुँचते हैं और महज़ 3:00 बजे विद्यालय बंद कर चले जाते हैं। इतने कम समय में कोई शैक्षणिक गतिविधि संभव ही नहीं है।ग्रामीणों का कहना है कि बच्चे रोज़ सुबह समय पर स्कूल पहुँचते हैं, परंतु दरवाजे बंद रहते हैं। न शिक्षक होते हैं, न कोई व्यवस्था। बच्चे घंटों स्कूल के बाहर खेलते हैं या सड़क पर बैठे रहते हैं। जब शिक्षक आते हैं, तब भी कोई पढ़ाई नहीं होती। शिक्षक का गैरजिम्मेदाराना रवैया: “घर का काम भी देखना पड़ता है”जब स्कूल देरी से खोलने और पढ़ाई न कराने को लेकर पालकों और NSUI कार्यकर्ताओं ने शिक्षक से सवाल किए तो उन्होंने जवाब दिया कि –।मुझे अपने घर का काम भी देखना पड़ता है, इसलिए समय से नहीं आ सकता।”यह जवाब एक सरकारी शिक्षक की जिम्मेदारी और नैतिकता पर सवाल खड़े करता है। इतना ही नहीं, जब बच्चे उनसे पढ़ाने की गुहार लगाते हैं, तो वे कहते हैं –।मुझे रजिस्टर का काम करना है, पढ़ाने का टाइम नहीं है।”शिक्षक विद्यालय में कुर्सी पर बैठकर निजी काम करते रहते हैं और बच्चे बिना देखरेख के बाहर खेलते रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि शिक्षक न तो अपने कर्तव्यों को लेकर गंभीर हैं और न ही बच्चों की शिक्षा को महत्व देते हैं। NSUI ने की तत्काल कार्रवाई की मांगइस मामले को गंभीरता से लेते हुए NSUI के ज़िला अध्यक्ष बादल गिरासे ने कहा –।”हमारे देश का भविष्य इन बच्चों में है, और यदि शिक्षक ही इस तरह से लापरवाही बरतेंगे तो बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। हमने मामले की शिकायत सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास विभाग बड़वानी से की है, जिन्होंने आश्वासन दिया है कि पांच दिनों में कार्रवाई की जाएगी। अगर समय सीमा में सुधार नहीं हुआ तो हम ज़िला मुख्यालय पर बड़ा आंदोलन करेंगे।पालक बोले – बच्चों का भविष्य हो रहा बर्बादविद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के पालक मुकेश खोटे, राजेश, राकेश, गेमसिंह, उमरावसिंह और बाला डावर (जिनके बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं) ने बताया कि स्कूल में कोई शिक्षण कार्य नहीं होता। वे रोज़ अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं, परंतु पढ़ाई की कोई गारंटी नहीं है। कुछ बच्चों ने तो स्कूल जाना ही बंद कर दिया है क्योंकि वहाँ कोई पढ़ाने वाला नहीं होता।मुकेश खोटे ने कहा “हम मजदूर लोग हैं, हमारे पास इतना समय नहीं कि रोज़ शिक्षक की शिकायत करें। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनें, लेकिन यहाँ तो स्कूल में कुछ भी नहीं हो रहा।”शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्हयह केवल जूनापानी गांव का मामला नहीं है, बल्कि आदिवासी अंचलों में ऐसे कई स्कूल हैं जहाँ शिक्षक मनमर्जी से काम कर रहे हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारी सिर्फ फाइलों में निरीक्षण दर्ज करते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है।यदि ऐसा ही चलता रहा तो आदिवासी अंचलों में साक्षरता दर घटती जाएगी और बच्चों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ेगा।NSUI ने उठाई ये माँगें:1. शिक्षक की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।2. प्रतिदिन की उपस्थिति व शिक्षण कार्य का निरीक्षण किया जाए।3. बच्चों के लिए पढ़ाई का नियमित कार्यक्रम लागू किया जाए।4. शिक्षक के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई हो और आवश्यकता हो तो स्थानांतरण किया जाए।5. शिक्षा अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। प्रशासन की भूमिका और प्रतिक्रियासहायक आयुक्त, आदिवासी विकास विभाग बड़वानी ने इस संबंध में NSUI प्रतिनिधियों से चर्चा कर स्पष्ट किया कि पाँच दिनों के भीतर जाँच कर उचित कार्रवाई की जाएगी। यदि शिक्षक दोषी पाया गया तो नियमानुसार कार्रवाई होगी।हालांकि ग्रामीणों और पालकों का विश्वास अब प्रशासन पर कम होता जा रहा है। उनका कहना है कि शिकायतें पहले भी की गईं, लेकिन परिणाम शून्य रहा। शिक्षा के मंदिर में अनुशासन जरूरी विद्यालय एक मंदिर की तरह है, जहाँ बच्चों का भविष्य गढ़ा जाता है। यदि शिक्षक ही उस मंदिर में पूजा करने की बजाय अपनी मर्जी से व्यवस्था चलाएं, तो यह न केवल शिक्षा का अपमान है बल्कि देश के भविष्य के साथ भी धोखा है।NSUI द्वारा उठाया गया यह कदम केवल एक गांव के लिए नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी अंचल की आवाज़ है, जो यह चाहती है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो और हर बच्चा अपने अधिकार के साथ शिक्षा प्राप्त करे।अब देखना यह है कि प्रशासन इस पर कितनी गंभीरता से काम करता है, या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह सरकारी फाइलों में दब कर रह जाएगा।

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