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जिनवाणी पर श्रद्धा रखना बहुत ही दुर्लभ एवं कठिन है

जिनवाणी पर श्रद्धा रखना बहुत ही दुर्लभ एवं कठिन है

▪️साध्वीश्री समीक्षणा श्रीजी ने श्री वर्धमान स्थानक भवन बखतगढ़ में धर्मसभा में कहा

बखतगढ़। व्यसनमुक्ति प्रणेता आचार्य श्री रामलालजी “रामेश” की आज्ञानुवर्तिनी शासन दीपिका साध्वीश्री समीक्षणा श्रीजी, बखतगढ़ गौरवश्री स्तुति श्रीजी एवं श्री अरुणिमा श्रीजी ठाणा 3 के सानिध्य एवं दर्शन, वंदन, व्याख्यान आदि का बखतगढ़ श्रीसंघ अच्छा लाभ ले रहा है। मंगलवार को धर्मसभा में शासन दीपिका साध्वीश्री समीक्षणा श्रीजी ने कहा कि भगवान महावीर स्वामीजी ने उत्तराध्ययन सूत्र में फरमाया है कि मनुष्य जन्म मिलना दुर्लभ है, जिनवाणी श्रवण करना दुर्लभ है और जिनवाणी पर श्रद्धा रखना बहुत ही दुर्लभ है, कठिन है एवं संयम में पराक्रम भी दुर्लभ है। भगवान अपने ज्ञान से देखकर कहते हैं और वह तीनों काल में सत्य ही रहता है। भगवान के वचनों पर शंका रखने की गुंजाइश ही नहीं होती है। भगवान को गर्भ में ही तीन ज्ञान हो जाते हैं। भगवान ने जन्म लेने के बाद साधना करके केवल ज्ञान प्राप्त किया।

केवल ज्ञान नहीं होता तब तक जीव छद्मस्त होता है

साध्वीजी ने नमक पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि नमक को कितना भी पीस लिया जाए उसमें जीव रह ही जाते हैं, इसलिए उसे सचित माना गया है। जीव को जब तक केवल ज्ञान नहीं होता है तब तक वह छद्मस्त होता है। जिस प्रकार एक मरीज डॉक्टर पर विश्वास रखकर गोली दवाई खाता है। इस विश्वास के साथ जीव को भगवान की जिनवाणी पर भी श्रद्धा रखकर उसे आचरण में लाना चाहिए। ताकि उसका जीवन संवर कर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सके।

साधार्मिक की सेवा बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है

धर्मसभा में बखतगढ़ गौरव साध्वी श्री स्तुतिश्रीजी ने कहा कि जीव को अपनी आत्मा का विकास करना है तो अच्छा दीजिए, अच्छा पीजिए और अच्छा कीजिए। दया एवं करुणा भाव है तो सभी प्राणी मात्र को साता, सुकून पहुंच सकती है। निस्वार्थ भाव से किए गए दान का ही महत्व है। साधर्मिक लोगों की सेवा करना भी बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है। जीव को वैर की गांठ कभी भी बांधकर नहीं रखना चाहिए। क्योंकि यह वैर भाव इस भव के साथ अगले भव को भी बिगाड़ देता है। महापुरुषों के गुणों को देखकर उन्हें आचारणित करेंगे तो कर्म की निर्जरा हो सकती है। गाढ़े चिकने कर्म बंधे हुए हैं उन्हें क्षय करने का पुरुषार्थ करना पड़ेगा। जैन होने की अनुभूति मात्र हो जाए तो हमारा जीवन बदल सकता है। व्याख्यान के बाद कनकमल पावेचा परिवार उज्जैन (बखतगढ़ वाले) की ओर से प्रभावना वितरित की गई।

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