एक मात्र सामाजिक साधना ही मोक्ष में जाने की पहली एवं अंतिम सीढ़ी है
-स्वाध्याय प्रेमी श्री हेमंतमुनिजी ने बखतगढ़ में धर्मसभा में कहा
बखतगढ़/दिलीप दरडा
जिनशासन गौरव आचार्यश्री उमेशमुनिजी के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तकश्री जिनेंद्रमुनिजी के आज्ञानुवर्ती स्वाध्याय प्रेमी श्री हेमंतमुनिजी ठाणा – 4 का ग्राम जलोदिया से विहार होकर बखतगढ़ के श्री पौषध शाला भवन में मंगल प्रवेश हुआ। साध्वीश्री संयमप्रभाजी एवं साध्वी वृंद व श्रावक श्राविकाओं ने ग्राम कोद रोड़ पर पहुंचकर चारित्र आत्माओं की अगवानी की। संयमी आत्माओं से श्रीसंघ के श्रावक श्राविकाओं ने बखतगढ़ के पौषध भवन में विहार की सुखसाता पूछी। यहां स्वाध्याय प्रेमी श्री हेमंतमुनिजी ने सभी को नियमित नियम देते हुए मांगलिक श्रवण करवाकर नियमित धर्म आराधना करने की प्रेरणा दी।
जीव का लक्ष्य एक मात्र मोक्ष प्राप्त करना है
स्वाध्याय प्रेमी श्री हेमंतमुनिजी ने बखतगढ़ के श्री वर्धमान स्थानक भवन में धर्मसभा में कहा कि जो व्यक्ति प्रत्येक जीव में उनके केवल गुण ही देखे वही वास्तव में आराधक होता है। जीव का लक्ष्य एक मात्र मोक्ष प्राप्त करना है। लेकिन वह सुख ढूंढता हुआ संसार में ही भटक रहा है। संसार का सुख क्षणिक सुख है। जो नरक में ही ले जाता है। संसार में सुख नहीं है इसीलिए तीर्थंकर भगवंतों ने संसार का त्याग कर संयम जीवन अंगीकार कर शुद्ध साधना करते हुए मोक्ष को प्राप्त किया है।
दोष से भागे वह योगी होता है
मुनिश्रीजी ने आगे कहा कि जो व्यक्ति दुःख से डरता है वह विराधक, दोष से डरता है वह आराधक एवं दुःख से भागे वह भोगी और जो दोष से भागे वह योगी होता है। एक मात्र सामाजिक साधना ही मोक्ष में जाने की पहली एवं अंतिम सीढ़ी है। सामायिक में समता होनी चाहिए। अंतर्मन के भाव से सामायिक तब होगी जब भाव शुद्ध हो और 18 पाप से दूर हो। व्यक्ति को अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में समभाव रखना चाहिए।
धर्म ही जीव का सच्चा साथी है
श्री चंद्रेशमुनिजी ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करते हैं, वह नरक में जाते हैं। धन, वैभव, प्रतिष्ठा ये सभी नरक में ले जाने वाले हैं। जीव उच्च कुल में जन्म लेता है तो उसकी माता बच्चों को अच्छे संस्कार देती है। जीव में क्षयोपक्षम होता है तो उसे सरलता से समझाया जा सकता है। स्वाध्याय, थोकड़े, श्रुत ज्ञान है तो वह केवल ज्ञानी बन सकता है। इंद्रियों के विषय संसार में भटकाने वाले हैं। इसलिए इंद्रियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। धर्म ही जीव का सच्चा साथी है। धर्म के बिना जीव जीवन अच्छा नहीं हो सकता है। साध्वी मंडल ने स्तवन प्रस्तुत किया।
13 संयमी आत्माओं का मिल रहा सानिध्य
स्वाध्याय प्रेमी श्री हेमंतमुनिजी, श्री चंद्रेशमुनिजी, श्री अमृतमुनिजी, श्री सुयशमुनिजी ठाणा 4 एवं साध्वीश्री संयमप्रभाजी “संयम”, श्री प्रज्ञाजी, श्री सुज्ञाजी, श्री हितज्ञाजी, श्री सौम्यप्रभाजी, श्री प्रेक्षाजी, श्री निष्ठाजी, श्री भव्यताजी एवं साध्वी श्री पूर्णताजी ठाणा 9 सहित कुल 13 चारित्र आत्माओं का पावन सानिध्य मिल रहा है। श्रावक श्राविकाएं सानिध्य का पूरा पूरा लाभ ले रहे है।


